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Sunday, February 16, 2014

क्या हम सबक ले पायेगे...?

भारत सदियों से एक गुलाम मुल्क रहा है। भारत पर अरबियों , मंगोलों , मुगलों , अंग्रेजो इत्यादि ने राज किया। इसकी एक बड़ी वज़ह ये थी कि जब-जब भारत में कोई सकारात्मक परिवर्तन होने को हुआ है कोई न कोई गद्दार ऐसा पैदा हुआ है जिसने उस परिवर्तन को ख़त्म करके भारत को गुलाम बना दिया। चाहे वह जयचंद जैसा गद्दार हो जिसने पृथ्वीराज चौहान को हराने में मुहम्मद ग़ौरी का साथ दिया या मीर जाफ़र जैसे गद्दार ने नवाब सिराजुद्दौला को हराने में अंग्रेज रोबर्ट क्लाइव का साथ दिया हो या फिर सिंधिया राजाओ ने महारानी लक्ष्मी बाई (झाँसी कि रानी) को मारने में अंग्रेजो का साथ दिया हो और या फिर नेहरू जैसे अंग्रेजो के एजेंट ने भारत का विभाजन करवाया हो। वर्तमान में भी जब ऐसा लगने लगा कि नरेंद्र मोदी जैसा कोई देशभक्त देश का प्रधानमंत्री बनेगा तो जयचंद और मीर जाफ़र की औलाद अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण जैसे गद्दारो ने देश की जनता का ध्यान बाँट दिया है ताकि भारत में एक बार फिर कोई सकारात्मक परिवर्तन न हो सकें।
 

Thursday, February 13, 2014

चाय पे चर्चा जन संवाद की अच्छी पहल, राजनीति को मिलेगी नई दिशा..

चाय पे चर्चा जनता से सीधा संवाद की ये एक अच्छी शुरुवात है। आज जहां नेता जनता से सीधे संवाद से घबराते हैं, नरेन्द्र मोदी जमीन से जुडे नेता है इसीलिए वे जनता से जुड़ने की नई नई तरकीब सोचते रहते है। मोदी ने जनता से सीधे संवाद स्थापित करके अच्छी पहल की है इससे लोगो में उनके प्रति भरोसा और बड़ेगा, इससे सबसे बड़ा फायदा ये है की आप की सोच आपकी नीति जनता को सीधे पता चलती है। और इससे भी अच्छा यह होगा की दूसरी पार्टियों के नेता भी एक मंच से आपस मे नीतियो पर (साम्प्रदायिकता पर नही) बहस करे जनता के सवालो के जवाब दे तब चुनाव हो जैसा की अमेरिका आदि देशों मे होता है। मणिशंकर ने मोदी को चायवाला बड़ी हिकारत की नजर से बोल था। लेकिन आज चाय वाला एक स्टेटस सिंबल हो गया है। अब तो लालू जी भी पैदाइसी चाय वाले हो गये है। लेकिन अब नीतिश जी क्या बोलेंगे ये देखने वाली बात है। कांग्रेस पार्टी ने 2014 के चुनाव मे भाजपा को एक मुद्दा अपनी तरफ से दे दिया है।
 "पहली बार हुआ की किसी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने आम जनता के सवालो का जवाब दिया हो अभी तक तो केवल टीवी पत्रकारों को ही इंटरव्यू दे कर नेता कहते रहे की वो जनता से जुड़े हुए हैं।"
कार्यक्रम मे मोदी जी का मुद्दो पर जवाब सुनकर दिल खुश हो गया लगा की देश मे ऐसा विकास पुरुष प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार है जो समस्याओ का गहराई से अध्ययन करके उनका समाधन कर सकता है। जिसको जमीनी हकीकत का पता है जिसमे गहन चिंतन करने की क्षमता है। 1947 में पटेल के बाद देश को ऐसा नेता मिला हैआज भी कुछ लोग उनसे सिर्फ गुजरात दंगो के पे ही बात करना चाहते है जबकि वो गुजरात को इससे कही आगे निकाल लाये है वहा सभी जाति, धर्मो का विकास हो रहा है और आज तक दुबारा कोई दंगा नही हुआ इसलिये इस विषय को अब पीछे छोड़ देना चाहिये। लेकिन कुछ तथाकतिथ सेक्युलर पार्टी इसको नही छोड़ सकती क्योकि उनकी पूरी राजनीति ही इसके दम पर चल रही है। मीडिया में भी कुछ वरिष्ठ पत्रकार मोदी पर निशाना बनाते रहते है और टीवी चैनल्स की बेहस में हर संभव कोशिश करते रहते है मोदी को नाकारने की और ये समझने की वो प्रधानमंत्री नही बन सकते और सिर्फ एक पार्टी का गुणगान करते रहते है जनता की आवाज को अनसुना करने से सच नही बदलेगा।

यह हमारे देश का परम सौभाग्य होगा कि मोदी जैसे व्यक्ति प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करेंगे हमें आशा है देश की जनता ऐसे स्वर्णिम अवसर को हाथ से जाने नही देगी!

Sunday, December 29, 2013

भास्कर ग्रुप / हीरो मोटर्स ने Aman होटल में कराई Congress+AAP में डील.....

अफवाहों से अलग खबर ये है कि कांग्रेस की AAP गैंग से डील Aman होटल में पक्की हुई थी. पहली मीटिंग 9 दिसम्बर को हुई थी. जिस उद्योगपति ने डील करवाई, उस बारे में 2 बातें पता चली हैं. भास्कर ग्रुप के चेयरमैन का नाम आया है. गौरतलब है कि भास्कर ग्रुप कोयला घोटाले में भी फंस चुका है और इसके खान्ग्रेस से गहरे सम्बन्ध हैं. दूसरे जिस उद्योगपति के नाम की संभावना और चर्चा ज़ोरों पर है वो है- पवन मुंजाल.
जी हाँ, हीरो मोटर्स का मालिक मुंजाल. मुंजाल की राहुल बजाज से प्रतिद्वंदिता किसी से छुपी नहीं है. राहुल बजाज से केजरीवाल ने करीब 5 महीने पहले मीटिंग की थी और एक तथाकथित सामाजिक मुद्दों पर टीवी चैनल शुरू करने के लिए मोटा चंदा माँगा था पर बजाज साहब ने ये कहते हुए मना कर दिया कि एक राजनैतिक पार्टी द्वारा शुरू किया जाने वाला चैनल राजनीति से अछूता नहीं रह सकता, इसलिए वो फंडिंग नहीं करेंगे. उसके बाद केजरीवाल पार्टी ने 2 महीने बाद ही अचानक से फैसला लिया कि वो मजदूर unions को सपोर्ट करेंगी और उसकी शुरुवात होगी बजाज पल्सर की महाराष्ट्र स्थित फैक्ट्री से. मतलब साफ़ था कि अगर बजाज साहब चंदा नहीं देंगे तो हम फैक्ट्री में हड़ताल करवा देंगे. तो ऐसे में बजाज के धुर विरोधी मुंजाल ने अगर ये डील करवाई तो मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा. PS: ये chapter क्लोज नहीं हो रहा है. दलाली किसने खायी उस गैंग का तो सबको पता है लेकिन जब तक पता नहीं चल जाता कि आखिर दलाली किसने करवाई, तब तक चैन नहीं पड़ेगा. एक Interesting fact (or coincidence?)- पवन मुंजाल को दिल्ली की अदालत ने हीरो मोटर्स में 550 मजदूरों को एक कॉन्ट्रैक्ट एजेंसी से hire करके फिर उसका पेमेंट मार लेने का दोषी पाया है. अब क्या भ्रष्टो पर कार्यवाही करने वाले युगपुरूष केजरीवाल पवन मुंजाल और इमाम बुखारी जैसो पर कार्यवाही करेंगे?


Thursday, October 31, 2013

प्रधानमंत्री नेहरू हैदराबाद की मुक्ति के लिए सरदार की योजना को असफल बनाना चाहता था!

1947 बैच के आईएएस अधिकारी एम.के. नायर ने अपने संस्मरण ''विद नो फीलिंग टू एनी बाडी'' में लिखा है कि प्रधानमंत्री नेहरू हैदराबाद की मुक्ति के लिए सरदार की योजना को असफल बनाना चाहता था । पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा एक कैबिनेट बैठक के दौरान सरदार को अपमानित और लांछित किया गया। उसने कहा ''आप पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझाव और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता।'' नेहरू उस बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाया जिसमें निजाम की निजी सेना रजाकारों के चंगुल से सेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार किया जा रहा था। हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुए कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब श्री पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। अगर एम.के. नायर द्वारा लिखित बातें वास्तविकता हैं तो कांग्रेस बताए कि सच क्या है?
नेहरू की लालसा, ब्रिटिश सरकार की चाहत, गांधी का नेहरू के प्रति मोह ने उन्हें देश की बागडोर नेहरू को देने के लिए विवश किया। गांधी के प्रति सम्मान के कारण राष्ट्र को समर्पित सरदार पटेल को झुकना पड़ा। इतिहास पढऩे पर कभी-कभी लगता है कि गांधी ने भी पटेल से इंसाफ नहीं किया। 
1920 से 1947 तक कांग्रेस के कुल 20 अधिवेशन हुए। 1939 को छोड़कर गांधी की इच्छा से ही अध्यक्ष बनाए जाते थे। कांग्रेस संगठन पर सरदार पटेल का प्रभुत्व था परन्तु गांधी सरदार पटेल की राय को उतना महत्व नहीं देता था । 1929 में प्रांतीय समितियों के अध्यक्ष पद के लिए गांधी के पक्ष में पांच, पटेल के पक्ष में तीन और नेहरू के पक्ष में दो मत आए परन्तु गांधी ने कहा कि पटेल मेरे साथ रहेगा। इस तरह सरदार पटेल को नामांकन वापस लेना पड़ा। हालांकि 1931 में कराची अधिवेशन में सरदार को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। 
अगर सरदार देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर का मसला हल हो गया था। भारत विभाजन की घोषणा होते ही जब पाकिस्तान की सेना ने कबायलियों के साथ कश्मीर क्षेत्र में घुसपैठ करा कर हमला किया तो भारतीय सेना ने तत्कालीन जनरल राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में संघर्ष करके पाक सेना को खदेड़ दिया। भारतीय सेना आगे बढ़ रही थी लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला प्रेम के कारण युद्ध विराम का आदेश दे दिया। कश्मीर में धारा 370 नेहरू और शेख अब्दुल्ला के दिमाग की उपज थी। नेहरू कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र परिषद में ले गया लेकिन आज तक क्या हुआ। काश! नेहरू ने कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति सरदार पटेल को दी होती तो पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग होता। सरदार पटेल ही नहीं मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने भी नेहरू से आक्रमण करके अधिकृत कश्मीर वाला अपना भूभाग वापस लेने को कहा, लेकिन नेहरू ने एक न मानी। मुझे नहीं लगता कि यह इतिहास आज के बच्चे पढ़ते होंगे, और कांग्रेस चाहती भी नहीं कि ऐसा इतिहास पढ़ा जाए। नरेन्द्र मोदी ने सरदार सरोवर में लौह पुरुष की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित की है तो कांग्रेस को दर्द क्यों है? शायद यही कि कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार से बड़ी किसी की प्रतिमा नहीं चाहते।

Thursday, October 10, 2013

बाबा रामदेव की सभाओं का खर्च ‪#‎BJP‬ के चुनावी खर्च में जोड़ा जाएगा : चुनाव आयोग

Monday, September 23, 2013

#Congress ने नीचता की हद की....

 

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